विजय सेतुपति (Vijay Sethupathi) एक बार फिर पर्दे पर उस जादुई खामोशी के साथ लौटे हैं, जो बड़े-बड़े डायलॉग्स पर भारी पड़ती है। उनकी नई क्राइम थ्रिलर ‘मुथु एंगिरा काट्टान’ (Muthu Alias Kaattaan) इन दिनों ओटीटी (OTT) की दुनिया में सस्पेंस का नया नाम बन गई है। एक ऐसी कहानी जिसकी शुरुआत ही एक ‘मुस्कुराते हुए कटे सिर’ से होती है, वह दर्शकों को अंत तक स्क्रीन से चिपके रहने पर मजबूर कर देती है। अगर आप डार्क थ्रिलर और रोंगटे खड़े कर देने वाले सस्पेंस के शौकीन हैं, तो Cineblitz के इस विस्तृत रिव्यू में जानें कि क्या यह फिल्म आपकी उम्मीदों पर खरी उतरती है।
एक खौफनाक शुरुआत और सस्पेंस का जाल
कहानी की शुरुआत एक ऐसे मोड़ से होती है जहाँ पुलिस को एक ‘मुस्कुराता हुआ कटा हुआ सिर’ मिलता है। यह दृश्य न केवल दर्शकों को चौंकाता है, बल्कि एक ऐसे रहस्य की नींव रखता है जो धीरे-धीरे तमिलनाडु के छोटे गांवों से होता हुआ मुंबई के खतरनाक अंडरवर्ल्ड तक जा पहुँचता है। लेखक और निर्देशक ने यहाँ सस्पेंस को इतनी बारीकी से बुना है कि आप हर अगले सीन में कातिल का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कहानी आपको बार-बार गलत साबित करती है।
विजय सेतुपति: खामोशी में छिपा हुआ तूफान
इस पूरी थ्रिलर की सबसे बड़ी जान विजय सेतुपति हैं। ‘काट्टान’ में उनका किरदार बहुत ज्यादा संवाद नहीं बोलता, लेकिन उनकी आँखों की गहराई और चेहरे के हाव-भाव पूरी कहानी कह जाते हैं। विजय ने एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया है जो अंदर से टूटा हुआ है लेकिन बाहर से पत्थर की तरह सख्त। उनकी एक्टिंग में वो ‘रॉ’ और ‘ऑर्गेनिक’ फील है, जो आजकल की बनावटी मसाला फिल्मों में अक्सर गायब रहती है।
सिनेमैटोग्राफी और डार्क विजुअल्स का कमाल
तकनीकी तौर पर यह प्रोजेक्ट काफी मजबूत है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी में ‘डार्क टोन’ का इस्तेमाल किया गया है, जो क्राइम थ्रिलर के मिजाज को पूरी तरह सपोर्ट करता है। मुंबई की तंग गलियों से लेकर तमिलनाडु के सुनसान रास्तों तक, हर फ्रेम एक अलग कहानी बयां करता है। बैकग्राउंड म्यूजिक (BGM) को लेकर भी खास मेहनत की गई है; यह लाउड नहीं है लेकिन जहाँ सस्पेंस को बढ़ाना होता है, वहाँ यह आपके दिल की धड़कनें तेज करने की काबिलियत रखता है।
अंडरवर्ल्ड और मानवीय संवेदनाओं का टकराव
‘काट्टान’ सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि यह इंसानी फितरत के अंधेरे कोनों को भी टटोलती है। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे अपराध की दुनिया में घुसने के बाद वापस लौटने का रास्ता बंद हो जाता है। मुंबई अंडरवर्ल्ड के चित्रण में निर्देशक ने किसी तरह की ‘ग्लैमरस’ चमक-धमक नहीं दिखाई है, बल्कि उसे उतना ही गंदा और डरावना दिखाया है जितना वह असल में होता है। फिल्म के सपोर्टिंग कास्ट ने भी विजय सेतुपति का बखूबी साथ दिया है।

