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फिल्म समीक्षा

कलंक रिव्यू: विभाजन की कहानी पर करण की डिज़ाइनर लीपापोती काम नहीं करती है

माधुरी दीक्षित, आलिया भट्ट, वरुण धवन, आदित्य रॉय कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, कुणाल खेमू, संजय दत्त के कलंक की एक झलक

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निर्देशक – अभिषेक वर्मन

कलाकार – माधुरी दीक्षित, आलिया भट्ट, वरुण धवन, आदित्य रॉय कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, कुणाल खेमू, संजय दत्त

करण जौहर के बैनर से जो भी फिल्में आती है उनके बारे में ऐसा कहा जाता है की वो सच्चाई से कोसो दूर रहती है। अभिषेक वर्मन निर्देशित और धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी कलंक कोई अपवाद नहीं है। कलंक , धर्मा की पुरानी परंपरा को ही आगे बढाती है। एक ऐसी फिल्म जिसका ताना बाना भारतीय इतिहास के एक बेहद ही महत्पूर्व अध्याय—विभाजन के इर्द-गिर्द बुना गया है लेकिन सच्चाई कही भी नज़र नहीं आती है। बात जब भी विभाजन या पार्टीशन की होती है तो जिन चीज़ो का ख्याल जेहन में सबसे पहले आता है वो होता है दुःख, परेशानी भरा माहौल और कई बेगुनाहो की मौत। एक ऐसा माहौल जिसको महज याद करने भर से ही दिल और दिमाग में सिहरन उठने लगती है। लेकिन कलंक में करन का डिज़ाइनर प्रेम एक बार फिर से आड़े आ गया है। काम शब्दों में कहे तोकलंक एक अंडर व्हेल्मिंग फिल्म है और देखते वक़्त ये निराश करती है। देखकर आश्चर्य होता है की टू स्टेट्स जैसी सटीक फिल्मे बनाने वाले अभिषेक वर्मन की दूसरी कोशिश इतनी लचर है।

फिल्म की कहानी लाहौर के पास के हुस्नापुर की है जहा पर देव चौधरी (आदित्य रॉय कपूर) अपनी पत्नी सत्या (सोनाक्षी सिन्हा) और पिता बलराज चौधरी (संजय दत्त) के साथ रहते है। देव का परिवार संभ्रांत है और हुस्नापुर मे वो एक अखबार चलाता है। अपनी पत्नी से वो बेहद प्रेम करता है लेकिन सत्या के पास जीने के लिए कुछ साल ही बचे है। हुस्नापुर में ही बहार बेगम (माधुरी दीक्षित) रहती है जो किसी ज़माने में अपने मुजरा के लिए जानी जाती थी लेकिन अब वो गाने की तालीम देती है। अनाथ ज़फर (वरुण धवन) भी वही रहता है और अपनी जीविका चलने के लिए लोहार का काम अब्दुल (कुणाल खेमू) के फैक्ट्री में करता है। सत्या को अपनी आने वाली मौत के बारे में इल्म है और इसी वजह से रूप (आलिया भट्ट) को गुजारिश करती है की वो उसके पति देव के साथ रहना शुरू कर दे ताकि आगे चलकर उसके न रहने के बाद वो उसके पति से शादी कर सके।

अभिनय के क्षेत्र में सभी ने अपनी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। इस मल्टी स्टारर फिल्म में भी आलिया भट्ट नें एक बार फिर से अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। आदित्य रॉय कपूर और सोनाक्षी सिन्हा फिल्म में बेहद ही शालीन दिख रहे हैं और उनका अभिनय बेहद  शानदार है। वरुण धवन कुछ जगहों पर ओवर एक्टिंग के शिकार हो गए है और उर्दू शब्द भी उनके अभिनय में कुछ हद तक ब्रेक लगाने का काम करती है। माधुरी दीक्षित पर निगाहें टिकी ही रहती हैं खासकर के जब वो फिल्म में नाचती है। संजय दत्त का स्क्रीन टाइम उतना ज्यादा नहीं है और उनका काम साधारण है। अलबत्ता कुणाल खेमू का काम काफी सधा हुआ है।

मौजूदा दौर में 168 मिनट की फिल्म बनाना शायद एक तरह से गुनाह माना जायेगा खासकर की ऐसी फिल्म जो सस्पेंस, कॉमेडी या थ्रिलर ना होकर एक सोशल फिल्म है। कई जगहों पर आप का ध्यान स्क्रीन के बदले आपके मोबाइल फ़ोन या घडी पर जाएगा या फिर मुमकिन है की कुछ मिनट के लिए आप इसकी झलकी भी लें । इसकी गति बेहद ही स्लो है। डायलॉग भी फिल्म के ऐसे है की सुनकर ऐसा लगता है की ये फिल्म मल्टी स्टार्रर है तो चलो कुछ डायलॉग ऐसे डाल देते है जिससे कुछ नतीजा निकल सके, लेकिन कही ना कही उनमे वो दम नहीं है।

पूरी फिल्म को देखते वक़्त मेरी परेशानी वही थी जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया है। जब पार्टीशन के बारे में बात होती है तो जहन में ‘तमस’ जैसे सीरियल या गरम हवा,और पिंजरा जैसी फिल्में जहन में बैठे हुई है। उन फिल्मों के रोम-रोम में संजीदगी बसी थी लेकिन फिल्म कलंक में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ आइटम सांग्स है, रंग बिरंगे परदे है, आलीशान मकान है और हद तो तब हो जाती है जब एक सीन में आदित्य रॉय कपूर और वरुण धवन साथ में नदी किनारे के घाट पर बैठ कर शराब पी रहे होते है। अगर आप करें तो घाट के पत्थरो को भी सुन्दर दिखाने के लिए लाल रंग से उन्हें पोत दिया गया है। इस बात पर मुझे बेहद संदेह है की पार्टीशन की कहानी पर डिज़ाइनर कूचा चलने के बाद जो कहानी निकली है। फिल्म कलंक निराश करती है और बेहतर होगा की अगले हफ्ते तक आप अवेंजर्स के कारनामो का इंतज़ार कर ले।

 

लेखक : अभिषेक श्रीवास्तव 

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